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प्रयागराज कुंभ मेला (उत्तर प्रदेश): कब होता है, कैसे होता है और इसका धार्मिक महत्व

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प्रयागराज कुंभ मेला भारत की सनातन परंपरा का सबसे भव्य और पवित्र आयोजन माना जाता है। यह केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या, वैराग्य और मोक्ष की खोज का महासंगम है। करोड़ों श्रद्धालु, साधु-संत और अखाड़े हर कुंभ में एकत्र होकर भारत की आध्यात्मिक शक्ति का परिचय देते हैं।

प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है, क्योंकि यही वह स्थान है जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम होता है। इसी संगम तट पर कुंभ मेले का आयोजन होता है।


प्रयागराज कुंभ मेला क्या है

कुंभ मेला उस समय आयोजित होता है जब ग्रहों की विशेष ज्योतिषीय स्थिति बनती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश की कुछ बूंदें जिन चार स्थानों पर गिरी थीं, उनमें प्रयागराज प्रमुख है। इन्हीं स्थानों पर कुंभ मेले की परंपरा शुरू हुई।

प्रयागराज कुंभ में पवित्र स्नान को आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना जाता है। यह आयोजन हजारों वर्षों से निरंतर चला आ रहा है।


प्रयागराज कुंभ कब होता है

प्रयागराज में कुंभ मेला तब आयोजित होता है जब
बृहस्पति ग्रह कुंभ राशि में और सूर्य मकर राशि में होता है।

यह विशेष ग्रह योग लगभग हर 12 वर्ष में बनता है, इसलिए प्रयागराज में पूर्ण कुंभ 12 साल के अंतराल पर आयोजित होता है। इसके बीच अर्ध कुंभ और महाकुंभ भी होते हैं।


प्रयागराज कुंभ कैसे होता है

कुंभ मेले की शुरुआत प्रमुख स्नान पर्वों से होती है। सबसे पहले शाही स्नान होता है, जिसमें विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत पारंपरिक रीति से संगम में स्नान करते हैं। इसके बाद सामान्य श्रद्धालुओं को स्नान का अवसर मिलता है।

कुंभ के दौरान प्रयागराज में अस्थायी शहर बसाया जाता है, जिसे मेला क्षेत्र कहा जाता है। इसमें

  • अखाड़ों के शिविर
  • संतों के प्रवचन
  • यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान
  • कल्पवास की व्यवस्था
  • चिकित्सा, सुरक्षा और यातायात की विशेष सुविधाएं

की जाती हैं। यह पूरा आयोजन कई सप्ताह तक चलता है।


शाही स्नान का महत्व

शाही स्नान कुंभ का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। मान्यता है कि शाही स्नान के दिन संगम में अमृत तत्व सर्वाधिक सक्रिय होता है। इस स्नान में अखाड़ों के नागा साधु, संन्यासी और महात्मा भाग लेते हैं।

शाही स्नान के दृश्य कुंभ को विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक आयोजन बनाते हैं।


कल्पवास क्या है

प्रयागराज कुंभ की एक विशेष परंपरा कल्पवास है। इसमें श्रद्धालु पूरे कुंभ काल के दौरान संगम तट पर रहकर संयमित जीवन जीते हैं। कल्पवासी

  • सात्विक भोजन करते हैं
  • नियमपूर्वक स्नान करते हैं
  • भजन, ध्यान और सत्संग में समय बिताते हैं

मान्यता है कि कल्पवास से जीवन के दोष दूर होते हैं और आत्मिक उन्नति होती है।


प्रयागराज कुंभ की धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रयागराज संगम में स्नान करने से

  • जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं
  • मन और आत्मा शुद्ध होती है
  • मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है

इसी कारण प्रयागराज कुंभ को सभी कुंभों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।


आख़िरी बार प्रयागराज कुंभ कब हुआ

प्रयागराज में
2019 में अर्ध कुंभ मेला आयोजित हुआ था, जिसमें रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।


अगला प्रयागराज कुंभ कब होगा

प्रयागराज में
2025 में महाकुंभ मेला आयोजित होगा, जिसे लगभग 144 वर्षों में एक बार होने वाला विशेष आयोजन माना जाता है। इसमें दुनिया भर से करोड़ों श्रद्धालुओं के आने की संभावना है।


निष्कर्ष

प्रयागराज कुंभ मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की आत्मा है। यह ऐसा अवसर है जहाँ धर्म, ज्योतिष, समाज और अध्यात्म एक साथ जीवंत हो उठते हैं। जो श्रद्धालु एक बार भी प्रयागराज कुंभ का अनुभव करता है, उसके जीवन में यह स्मृति हमेशा के लिए बस जाती है।

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