अस्सी घाट वाराणसी का वह घाट है जहाँ शोर नहीं, शांति बोलती है।
अगर दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती भव्य और ऊर्जावान है, तो अस्सी घाट की गंगा आरती सुकून, ध्यान और आत्मिक स्थिरता का अनुभव कराती है।
यह घाट खास तौर पर उन लोगों के लिए जाना जाता है जो गंगा को देखने नहीं, महसूस करने आते हैं।
अस्सी घाट कहाँ स्थित है
अस्सी घाट उत्तर प्रदेश के पवित्र नगर वाराणसी में स्थित है।
यह घाट गंगा नदी के दक्षिणी छोर पर है, जहाँ अस्सी नामक छोटी नदी गंगा में मिलती है। इसी संगम के कारण इस घाट को अस्सी घाट कहा जाता है।
अस्सी घाट का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
पुराणों के अनुसार, अस्सी घाट का संबंध भगवान शिव से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि एक युद्ध के बाद भगवान शिव ने अपनी तलवार यहीं रखी थी, जिससे अस्सी नदी का नाम पड़ा।
यह घाट सदियों से संतों, योगियों और साधकों का प्रिय स्थल रहा है। यहाँ का वातावरण साधना और चिंतन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है।
अस्सी घाट की गंगा आरती क्या है
अस्सी घाट की गंगा आरती सुबह सूर्योदय से पहले होती है और इसे अक्सर
“सुबहे-बनारस” कार्यक्रम के नाम से भी जाना जाता है।
यह आरती तेज शंखनाद और अग्नि से अधिक
- मंत्र
- भजन
- योग
- ध्यान
पर आधारित होती है। यहाँ आरती देखने वाला व्यक्ति दर्शक नहीं, भागीदार बन जाता है।
अस्सी घाट की गंगा आरती कैसे होती है
आरती की शुरुआत मौन और मंत्रोच्चार से होती है। इसके बाद
- योगासन
- प्राणायाम
- वैदिक मंत्र
- भजन और श्लोक पाठ
के साथ माँ गंगा की आरती की जाती है।
पूरे समय वातावरण इतना शांत रहता है कि केवल गंगा की लहरों और मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती है।
अस्सी घाट की गंगा आरती का आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता है कि
- यहाँ की आरती मन को स्थिर करती है
- नकारात्मक विचार शांत होते हैं
- आत्मचिंतन की अवस्था बनती है
- दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा से होती है
कई साधक मानते हैं कि अस्सी घाट की सुबह की आरती ध्यान के समान प्रभाव देती है।
अस्सी घाट पर कौन-कौन आता है
अस्सी घाट पर आपको
- योग साधक
- विदेशी पर्यटक
- छात्र
- लेखक और कलाकार
- शांत वातावरण पसंद करने वाले श्रद्धालु
अधिक देखने को मिलेंगे। यह घाट भीड़ से दूर, एकांत का अनुभव देता है।
अस्सी घाट कब जाना सबसे अच्छा है
अस्सी घाट की गंगा आरती पूरे वर्ष होती है, लेकिन
- सर्दियों की सुबह
- सावन माह
- देव दीपावली के आसपास
यहाँ का अनुभव और भी विशेष हो जाता है।
दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट में अंतर
दशाश्वमेध घाट जहाँ उत्सव है,
वहीं अस्सी घाट साधना है।
दशाश्वमेध घाट आँखों को चकाचौंध देता है,
अस्सी घाट मन को ठहराव देता है।
निष्कर्ष
अस्सी घाट उन लोगों के लिए है जो गंगा को शोर में नहीं, शांति में देखना चाहते हैं।
यह घाट बताता है कि अध्यात्म केवल उत्सव नहीं, मौन भी हो सकता है।
अगर आप वाराणसी में गंगा आरती का एक अलग, गहरा और शांत अनुभव चाहते हैं,
तो अस्सी घाट आपके लिए सर्वोत्तम स्थान है।

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