हर की पौड़ी केवल एक घाट नहीं है, यह हरिद्वार की आत्मा है।
यही वह स्थान है जहाँ माँ गंगा पहाड़ों से उतरकर समूचे भारत को जीवन देती हैं।
शाम होते ही जब दीप जलते हैं और गंगा आरती शुरू होती है, तो पूरा वातावरण श्रद्धा और शांति से भर जाता है।
हर की पौड़ी की गंगा आरती दिखावा नहीं, संयम और भक्ति का अभ्यास है।
हर की पौड़ी कहाँ स्थित है
हर की पौड़ी उत्तराखंड के पवित्र नगर हरिद्वार में स्थित है।
यह वही स्थान है जहाँ गंगा नदी पहाड़ों को छोड़कर मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है।
इसी कारण हरिद्वार को गंगा द्वार कहा जाता है।
हर की पौड़ी नाम का अर्थ और मान्यता
“हर” का अर्थ भगवान विष्णु या शिव से है और
“की पौड़ी” का अर्थ है उनके चरण।
मान्यता है कि भगवान विष्णु के चरणचिह्न आज भी हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड क्षेत्र में मौजूद हैं।
इसी कारण इस घाट को अत्यंत पवित्र माना जाता है।
हर की पौड़ी की गंगा आरती क्या है
हर की पौड़ी की गंगा आरती प्रतिदिन सूर्यास्त के समय होती है।
यह आरती माँ गंगा को समर्पित होती है और अत्यंत अनुशासित व मर्यादित रूप में संपन्न की जाती है।
यहाँ की आरती में
- सामूहिक मंत्रोच्चार
- दीप प्रज्वलन
- पुष्प अर्पण
- मौन और श्रद्धा
का विशेष महत्व होता है।
हर की पौड़ी की गंगा आरती कैसे होती है
आरती शुरू होने से पहले पूरा घाट शांत हो जाता है।
पुजारी मंत्रोच्चार के साथ आरती आरंभ करते हैं और श्रद्धालु हाथ जोड़कर माँ गंगा का स्मरण करते हैं।
आरती के दौरान
- सैकड़ों दीप गंगा में प्रवाहित किए जाते हैं
- पूरा घाट दीपों की रोशनी से जगमगा उठता है
- वातावरण में शांति और भक्ति का भाव छा जाता है
यह दृश्य अत्यंत सरल, लेकिन गहराई से प्रभावशाली होता है।
हर की पौड़ी की गंगा आरती का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता है कि
- यहाँ गंगा स्नान और आरती देखने से पापों का नाश होता है
- मन की अशांति दूर होती है
- जीवन में संयम और सकारात्मकता आती है
कुंभ और अर्ध कुंभ के समय हर की पौड़ी की आरती का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
कुंभ मेले में हर की पौड़ी की भूमिका
हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान हर की पौड़ी सबसे प्रमुख स्नान स्थल होती है।
शाही स्नान, पर्व स्नान और विशेष अनुष्ठान यहीं होते हैं।
कुंभ के समय यहाँ की गंगा आरती
आस्था, व्यवस्था और अनुशासन का आदर्श उदाहरण बन जाती है।
हर की पौड़ी कब जाएँ
हर की पौड़ी की गंगा आरती पूरे वर्ष होती है, लेकिन
- कार्तिक पूर्णिमा
- गंगा दशहरा
- सावन मास
- कुंभ और अर्ध कुंभ
के समय यहाँ का अनुभव विशेष रूप से दिव्य होता है।
दशाश्वमेध, अस्सी और हर की पौड़ी में अंतर
दशाश्वमेध घाट उत्सव है
अस्सी घाट ध्यान है
और हर की पौड़ी अनुशासन में डूबी श्रद्धा है
तीनों अलग हैं, लेकिन तीनों गंगा के अलग-अलग रूप दिखाते हैं।
निष्कर्ष
हर की पौड़ी पर होने वाली गंगा आरती यह सिखाती है कि
भक्ति केवल भाव नहीं, मर्यादा भी होती है।
यहाँ न शोर है, न दिखावा — केवल श्रद्धा है।
जो भी व्यक्ति हर की पौड़ी की संध्या आरती देखता है,
वह गंगा को केवल नदी नहीं, माँ के रूप में अनुभव करता है

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