हरिद्वार कुंभ मेला भारत की सनातन परंपरा का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण आयोजन है। यह गंगा नदी के तट पर आयोजित होता है, जहाँ माँ गंगा हिमालय से उतरकर पहली बार मैदानी भूमि में प्रवेश करती हैं। इसी कारण हरिद्वार को गंगा द्वार कहा जाता है।
हरिद्वार कुंभ केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि योग, तपस्या और वैराग्य की परंपरा का जीवंत रूप है। यहाँ कुंभ के दौरान साधु-संतों, अखाड़ों और करोड़ों श्रद्धालुओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
हरिद्वार कुंभ मेला क्या है
हरिद्वार कुंभ मेला उन चार प्रमुख कुंभ मेलों में से एक है, जिनका उल्लेख प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश की एक बूंद हरिद्वार में गिरी थी, जिसके कारण यह स्थान कुंभ के लिए अत्यंत पवित्र माना गया।
हरिद्वार कुंभ का केंद्र बिंदु गंगा स्नान है, जिसे आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की दिशा में पहला कदम माना जाता है।
हरिद्वार कुंभ कब होता है
हरिद्वार में कुंभ मेला तब आयोजित होता है जब
बृहस्पति ग्रह कुंभ राशि में प्रवेश करता है और सूर्य मेष राशि में स्थित होता है।
यह विशेष ज्योतिषीय योग लगभग हर 12 वर्ष में बनता है। इसी कारण हरिद्वार में कुंभ मेला 12 वर्षों के अंतराल पर आयोजित किया जाता है।
हरिद्वार कुंभ कैसे होता है
हरिद्वार कुंभ की शुरुआत प्रमुख स्नान पर्वों से होती है। सबसे पहले शाही स्नान आयोजित होता है, जिसमें विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत गंगा नदी में पारंपरिक विधि से स्नान करते हैं। इसके बाद सामान्य श्रद्धालुओं को स्नान का अवसर दिया जाता है।
कुंभ के दौरान हरिद्वार में एक विशाल अस्थायी मेला क्षेत्र बसाया जाता है, जिसमें
- अखाड़ों के शिविर
- संतों के प्रवचन
- योग और साधना कार्यक्रम
- धार्मिक अनुष्ठान
- स्वास्थ्य, सुरक्षा और यातायात की विशेष व्यवस्था
की जाती है।
हर की पौड़ी और शाही स्नान का महत्व
हरिद्वार कुंभ का सबसे पवित्र स्थल हर की पौड़ी मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि देवताओं ने इसी स्थान पर अमृत स्नान किया था। शाही स्नान के दौरान हर की पौड़ी का दृश्य अत्यंत दिव्य और अनुशासित होता है।
मान्यता है कि शाही स्नान के दिन गंगा में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
हरिद्वार कुंभ की धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार हरिद्वार कुंभ में गंगा स्नान करने से
- पापों का नाश होता है
- मन और आत्मा शुद्ध होती है
- जीवन में आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है
यह कुंभ तप, संयम और वैराग्य की परंपरा का प्रतीक माना जाता है।
आख़िरी बार हरिद्वार कुंभ कब हुआ
हरिद्वार में
2021 में कुंभ मेला आयोजित हुआ था। यह कुंभ विशेष परिस्थितियों में सीमित अवधि के लिए आयोजित किया गया था, फिर भी श्रद्धालुओं की भारी सहभागिता देखने को मिली।
अगला हरिद्वार कुंभ कब होगा
हरिद्वार में
2033 में अगला कुंभ मेला आयोजित होने की परंपरा है। इस दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं के हरिद्वार पहुंचने की संभावना रहती है।
निष्कर्ष
हरिद्वार कुंभ मेला केवल स्नान का आयोजन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना और सनातन परंपरा का जीवंत उत्सव है। यहाँ गंगा के पवित्र जल में स्नान करने से श्रद्धालु अपने भीतर नई ऊर्जा और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।
हरिद्वार कुंभ वह अवसर है जहाँ आस्था, अनुशासन और अध्यात्म एक साथ प्रवाहित होते हैं।

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