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महाकाल की नगरी उज्जैन सदियों पहले क्यों कहलाती थी अवंतिका नगरी, जानें वजह

उज्जैन
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आगामी सिंहस्थ 2028 (Simhastha 2028) को लेकर उज्जैन में तैयारियां अभी से सुगबुगाने लगी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस शहर को आज हम उज्जैन के नाम से जानते हैं, उसे सदियों पहले अवंतिका नगरी (City of Avantika) क्यों कहा जाता था? यह केवल एक शहर नहीं, बल्कि काल की गणना का वह केंद्र है। यहां स्वयं महादेव महाकाल के रूप में विराजमान हैं। आइए, इतिहास और आस्था के पन्नों को पलटते हुए इस अद्भुत नगरी के रहस्यों को करीब से देखते हैं।

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अवंतिका: गौरवशाली विजेता और मोक्ष की नगरी

प्राचीन ग्रंथों और स्कंदपुराण (Skanda Purana) के अवंतिखंड में इस भूमि की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में इसे उज्जयिनी (Ujjayini) कहा जाता था, जिसका अर्थ है एक गौरवशाली विजेता। इसे ‘अवंतिका’ इसलिए कहा गया क्योंकि यह मोक्ष देने वाली सात पवित्र नगरियों (Saptapuri) में से एक है। समय के साथ इसके कई नाम पड़े जैसे कनकश्रृंगा, कुशस्थली, भाग्यवती और अमरावती, लेकिन इसकी आत्मा हमेशा महाकाल में ही बसी रही।

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ब्रह्मांड का केंद्र: जहां ठहर कर समय खुद को मापता है

उज्जैन को लेकर एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तथ्य बेहद चौंकाने वाला है। माना जाता है कि उज्जैन पूरे आकाश का मध्य स्थान और पृथ्वी का केंद्र (Center of the Earth) है। प्राचीन भारतीय भूगोल के अनुसार, यहीं से पूरे ब्रह्मांड की कालगणना (Time calculation) निर्धारित होती है। मंगल ग्रह का जन्मस्थान माना जाने वाला अंगारेश्वर मंदिर (Angareshwar Temple) यहीं स्थित है और यहीं से कर्क रेखा (Tropic of Cancer) भी गुजरती है। इसीलिए महाकाल को समय का अधिपति कहा जाता है।

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दक्षिणमुखी महाकाल: यमराज के दंड से मुक्ति का द्वार

दुनिया भर में 12 ज्योतिर्लिंग हैं, लेकिन उज्जैन के महाकालेश्वर (Mahakaleshwar) इकलौते ऐसे ज्योतिर्लिंग हैं जो दक्षिणमुखी (South facing) हैं। शास्त्रों के अनुसार, दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता यमराज की मानी जाती है। चूंकि शिव स्वयं कालों के काल हैं, इसलिए दक्षिणमुखी होकर वे अपने भक्तों को अकाल मृत्यु के भय और यमराज के दंड से मुक्ति दिलाते हैं। यहां का महामृत्युंजय जाप (Mahamrityunjay Jaap) भक्तों के लिए किसी सुरक्षा कवच से कम नहीं है।

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भस्म आरती का रहस्य

महाकाल की भस्म आरती (Bhasma Aarti) पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसके पीछे कई गहरी मान्यताएं हैं। एक कथा के अनुसार, जब देवी सती ने यज्ञ कुंड में आत्मदाह किया, तो वियोग में शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर भटकने लगे। तब भगवान विष्णु ने शिव का मोह भंग करने के लिए सती के शरीर को भस्म में बदल दिया, जिसे शिव ने अपने शरीर पर मल लिया। वहीं, एक अन्य मत कहता है कि भस्म इस बात का प्रतीक है कि अंत में सब कुछ राख होना है, इसलिए मोह-माया त्याग कर शिव की शरण में आना ही सत्य है।

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उज्जैन का अनसुना नियम

उज्जैन के इतिहास में राजा विक्रमादित्य (King Vikramaditya) का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। मान्यता है कि उनके सिंहासन छोड़ने के बाद से आज तक यहां कोई दूसरा राजा रात नहीं बिता सका। कहा जाता है कि इस नगरी के असली राजा केवल महाकाल हैं। आज के दौर में भी कोई मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति यहां रात में रुकने का साहस नहीं करता। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी बड़े राजनेता (जैसे मोरारजी देसाई या येदियुरप्पा) ने यहां रात बिताई, उन्हें जल्द ही अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ा।

उज्जैन के महाकाल मंदिर कैसे जाएं?

उज्जैन का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। यहां का रेलवे स्टेशन, उज्जैन जंक्शन, और सड़क मार्ग दोनों से पहुंचना बहुत आसान है। सबसे पास हवाई अड्डा इंदौर है, जो यहां से करीब 60 किमी दूर है, और वहां से आप टैक्सी ले सकते हैं। मंदिर स्टेशन और बस स्टैंड से लगभग 2-3 किमी दूर है, जहां ऑटो और टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं।

महाकाल मंदिर का लोकेशन जानने के लिए लिंक पर क्लिक करें…https://share.google/OXXHIyNVlga6Xt0vE

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