कुबेर देव के पूर्वजन्म की कहानी: हिंदू धर्म में कुबेर देव का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। उन्हें धन, वैभव और समृद्धि का साक्षात देवता माना जाता है। हर साल धनतेरस और दीपावली पर लक्ष्मी-कुबेर पूजा की जाती है। मान्यता है कि उनकी पूजा करने से घर की दरिद्रता दूर होती है। इंसान के जीवन से पैसों की हर तंगी हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।
पौराणिक ग्रंथों में कुबेर की कहानी
कुबेर देव के पूर्वजन्म की कहानी: पौराणिक ग्रंथों में कुबेर देव के परिवार का भी जिक्र मिलता है। वे लंकापति राजा रावण के सौतेले भाई माने जाते हैं। इसके साथ ही कुबेर की पहचान यक्षों के राजा के रूप में भी है। वे ब्रह्मांड के उत्तर दिशा के दिक्पाल और लोकपाल भी कहे जाते हैं। उन्हें संसार की नौ निधियों का परम स्वामी और रक्षक माना गया है।
पौराणिक कथाएं में कुबेर देव के पिता का नाम महर्षि विश्रवा था। उनकी माता का नाम देववर्णिणी था। कुबेर देव बचपन से ही महादेव के बहुत बड़े भक्त थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्हें यह धनपति का पद कैसे मिला? इसके पीछे पुराणों में एक बेहद दिलचस्प और अनोखी कहानी बताई गई है।
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स्कंद पुराण में कुबेर के पूर्वजन्म का इतिहास
कुबेर देव के पूर्वजन्म की कहानी: स्कंद पुराण में कुबेर देव के पिछले जन्म की बड़ी रोचक कथा है। इसके मुताबिक, पूर्वजन्म में कुबेर देव एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। तब उनका नाम गुणनिधि रखा गया था। गुणनिधि पढ़ा-लिखा तो था पर उसमें एक बहुत बड़ा अवगुण था। वह बुरी संगति में पड़कर चोरी-चकारी करने लगा था।
जब इस बात की खबर उसके सीधे-साधे पिता को लगी तो वे दुखी हुए। उन्होंने गुस्से में आकर गुणनिधि को अपने घर से बाहर निकाल दिया। घर से निकलने के बाद गुणनिधि दाने-दाने को तरसने लगा। वह भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकने लगा।
भटकते हुए वह एक शिव मंदिर के पास पहुंच गया। रात का समय था और मंदिर में बहुत अंधेरा था। वहां कुछ लोग भगवान शिव को भोग लगाने आए थे। गुणनिधि ने उस स्वादिष्ट प्रसाद को चुराने का एक बड़ा प्लान बनाया। वह चुपके से मंदिर के गर्भगृह के अंदर घुस गया।
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अनजाने में किए किस काम से खुश हुए भोलेनाथ
कुबेर देव के पूर्वजन्म की कहानी: उस समय शिव मंदिर के अंदर एक पुजारी सो रहा था। पुजारी की नजर से बचने के लिए गुणनिधि बहुत सावधानी से बढ़ा। मंदिर का मुख्य दीपक उस समय धीरे-धीरे बुझने की कगार पर था।
दीपक की रोशनी बहुत कम हो गई थी जिससे अंधेरा बढ़ रहा था। गुणनिधि को डर था कि अंधेरे में वह पकड़ा न जाए। इसलिए उसने दीपक की लौ को तेज करने की कोशिश की। उसने दीपक के सामने अपना एक साफ तौलिया फैला दिया।
इससे हवा रुक गई और बुझता हुआ दीपक फिर से चमक उठा। तभी अचानक पुजारी की आंख खुल गई और उसने उसे देख लिया। वहां चोर-चोर का शोर मच गया। मंदिर से भागते समय हुई हाथापाई में गुणनिधि की मौत हो गई। उसकी मौत के बाद यमराज के दूत उसकी आत्मा को लेने आए।
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चोर से देवताओं के खजांची बनने का अद्भुत सफर
तभी वहां पर भगवान शिव के गण भी पहुंच गए। शिव के गणों ने यमदूतों को रोक दिया। वे गुणनिधि की आत्मा को सीधे भोलेनाथ के सामने ले गए। भगवान शिव ने गुणनिधि के केवल अच्छे काम को देखा।
महादेव को लगा कि गुणनिधि ने उनके लिए जलते दीपक की रक्षा की है। उसने हवा से दीपक को बुझने से बचाने के लिए कपड़ा बिछाया था। भले ही उसका इरादा चोरी का था पर उसने शिव की ज्योति बचाई थी। इसी एक पुण्य काम से भोलेनाथ बेहद प्रसन्न हो गए।
शिव जी ने गुणनिधि के पिछले सारे पाप माफ कर दिए। उन्होंने गुणनिधि को अगले जन्म में कुबेर की बड़ी उपाधि दे दी। साथ ही उन्हें देवताओं का मुख्य खजांची और धनपति बना दिया।
इस तरह एक चोर भगवान शिव की कृपा से धन का स्वामी बन गया। कुबेर देवता की यह कहानी आज भी करोड़ों भक्तों को प्रेरणा देती है। सच्चे मन से की गई पूजा कभी भी खाली नहीं जाती है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।

