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बिना कन्या पूजन के क्यों अधूरा माना जाता है नवरात्रि का व्रत

kanya pujan
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Kanya Pujan Niyam: नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा की भक्ति पूरे श्रद्धा भाव से की जाती है। इन नौ दिनों में भक्त व्रत रखते हैं और मां की पूजा-अर्चना करते हैं। देवीभागवत पुराण के मुताबिक, नवरात्र का व्रत कन्या पूजन के बिना अधूरा और निष्फल माना जाता है।

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महाष्टमी और महानवमी के दिन छोटी कन्याओं को घर पर बुलाया जाता है। उन्हें मां दुर्गा का साक्षात रूप मानकर बहुत आदर से पूजा जाता है। कन्याओं के चरणों को धोकर टीका लगाया जाता है और उन्हें भोजन कराया जाता है।

माना जाता है कि कन्याओं को तृप्त करने से देवी मां तुरंत प्रसन्न होती हैं। शास्त्रों के मुताबिक, बालिकाओं में किसी भी तरह का छल-कपट या छल नहीं होता। उनका कोमल मन साक्षात देवी का वास स्थान बनता है। इसलिए नवरात्र में कंचक पूजा का बहुत बड़ा महत्व है।

2 से 10 साल की कन्याकन्या पूजन से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के मुताबिक, कन्या पूजन की परंपरा के पीछे बहुत पुरानी और सुंदर पौराणिक कथा छिपी है। एक बार बाणासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में भारी आतंक मचा रखा था। उसके अत्याचारों से सभी देवता और मनुष्य बेहद परेशान और दुखी हो गए थे।

बाणासुर को वरदान था कि उसकी मृत्यु केवल एक कुमारी कन्या के हाथों होगी। तभी सभी देवताओं ने मिलकर आद्याशक्ति मां भगवती की बहुत कठिन तपस्या की।

देवताओं की पुकार सुनकर देवी ने एक छोटी कन्या के रूप में जन्म लिया। उस छोटी कन्या ने अपनी शक्ति से पापी राक्षस बाणासुर का वध कर दिया। तभी से समाज में छोटी कन्याओं को पूजने की पवित्र प्रथा शुरू हुई। लोग कन्याओं में देवी शक्ति का रूप देखकर उनका पूजन करने लगे।

दो साल की कन्या को कहते हैं कुमारिका

देवीभागवत पुराण के मुताबिक, कन्या पूजन में दो साल की कन्या को पूजने का अलग विधान है। दो वर्ष की छोटी बालिका को शास्त्रों में कुमारिका रूप माना जाता है। इस उम्र की कन्या की पूजा करने से घर के सभी दुख दूर होते हैं।

कुमारिका पूजन से घर में दरिद्रता खत्म होती है और धन की आवक बढ़ती है। परिवार में सुख और शांति का माहौल हमेशा के लिए बना रहता है। इस छोटी बच्ची को देखकर मन में बहुत पवित्र भाव जागते हैं।

तीन साल की कन्या का त्रिमूर्ति रूप

देवीभागवत पुराण के मुताबिक, तीन साल की कन्या को शास्त्रों में त्रिमूर्ति रूप माना गया है। त्रिमूर्ति रूप की पूजा करने से घर में खुशहाली और समृद्धि आती है। इस उम्र की कन्या के पूजन से धन और अनाज की कमी नहीं होती। परिवार के सभी सदस्यों का जीवन सुखमय और मंगलकारी बना रहता है। व्यापार और नौकरी में आगे बढ़ने के नए-नए रास्ते खुलने लगते हैं।

चार साल की कन्या का कल्याणी रूप

चार साल की छोटी कन्या को कल्याणी रूप कहा जाता है। कल्याणी रूप की सच्चे मन से पूजा करने से सर्व मंगल होता है। इस रूप की आराधना करने से परिवार में विद्या और ज्ञान बढ़ता है। घर के बच्चों को पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छी सफलता मिलने लगती है। जीवन में आने वाली रुकावटें और बाधाएं धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं।

पांच साल की कन्या का रोहिणी रूप

पांच साल की कन्या को रोहिणी का सुंदर रूप माना जाता है। रोहिणी रूप की पूजा करने से व्यक्ति के सभी रोग दूर होते हैं। स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां खत्म होती हैं और इंसान निरोगी बनता है। परिवार के लोगों की आयु बढ़ती है और शारीरिक ताकत में वृद्धि होती है। घर से बीमारियां हमेशा के लिए दूर भाग जाती हैं।

छह साल की कन्या का कालिका रूप

छह साल की कन्या को मां कालिका का रूप माना जाता है। कालिका रूप की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। अगर आपका कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसमें सफलता मिलती है। विरोधी आपके सामने कमजोर पड़ने लगते हैं और आपका प्रभाव बढ़ता है। भय और डर से मुक्ति पाने के लिए यह पूजन बहुत शुभ है।

सात साल की कन्या का चंडिका रूप

सात साल की कन्या को मां चंडिका का रूप माना गया है। चंडिका रूप की पूजा से घर में हर तरह का ऐश्वर्य आता है। रुकी हुई संपत्ति और रुका हुआ धन आसानी से वापस मिल जाता है। समाज में आपका मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ने लगती है। हर काम में आपको किस्मत का पूरा साथ मिलने लगता है।

आठ साल की कन्या का शाम्भवी रूप

देवीभागवत पुराण के मुताबिक, आठ साल की कन्या को शाम्भवी रूप कहा जाता है। शाम्भवी रूप की पूजा करने से सभी तरह के वाद-विवाद सुलझ जाते हैं। कोर्ट-कचहरी के मामलों से आसानी से राहत और मुक्ति मिल जाती है। समाज में लोकप्रियता बढ़ती है और लोग आपकी बात का सम्मान करते हैं।

नौ साल की कन्या का दुर्गा रूप

नौ साल की कन्या को साक्षात मां दुर्गा का रूप माना जाता है। नौ वर्ष की कन्या पूजन से पृथ्वी की परिक्रमा जितना फल मिलता है। असंभव लगने वाले काम भी बहुत आसानी से पूरे होने लगते हैं। जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयां दूर होती हैं और शांति मिलती है।

दस साल की कन्या का सुभद्रा रूप

देवीभागवत पुराण के मुताबिक, दस साल की कन्या को मां सुभद्रा का पवित्र रूप कहा जाता है। सुभद्रा रूप की पूजा करने से मन की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। घर-परिवार में कोई भी बड़ा संकट या दुख कभी नहीं आता। संपूर्ण जीवन में केवल सुख, शांति और आनंद का वास रहता है।

कन्या पूजन की विधि

देवीभागवत पुराण के मुताबिक, कन्या पूजन वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें। पूरे घर की अच्छे से सफाई करें और शुद्ध वातावरण बनाएं। फिर घर पर नौ कन्याओं और एक बटुक (भैरव) को आदर से बुलाएं। सभी कन्याओं के पैर साफ पानी या दूध से धोएं। पैर पोंछकर उन्हें साफ और सुंदर आसन पर प्रेम से बिठाएं।

उनके माथे पर कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाएं। हाथों में लाल कलावा बांधें और पैरों में महावर लगाएं। इसके बाद कन्याओं को पूरी, हलवा और चने का भोग परोसें। भोजन कराने के बाद उन्हें फल, उपहार और दक्षिणा देकर विदा करें। उनके चरण छूकर आशीर्वाद लें और जयकारे लगाएं।

पूजन में क्या करें और क्या न करें

कन्या पूजन के समय हमेशा कुछ खास बातों का ध्यान रखें। कन्याओं को भोजन कराने में कोई जल्दबाजी या गुस्सा कभी न करें। उन्हें बहुत प्यार और आदर के साथ भोजन परोसें। कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भैरव रूप में जरूर जिमाएं।

बिना बटुक पूजन के कन्या पूजन अधूरा माना जाता है। कन्याओं को उपहार में लोहे की चीजें या तीखी चीजें न दें। उन्हें लाल कपड़े, फल, कॉपी-पेन या श्रृंगार की सामग्री दें। बासी या गंदा खाना कन्याओं को कभी भी न परोसें।

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।

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