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बांके बिहारी मंदिर में क्यों नहीं बजती घंटी? जानें रहस्य

बांके बिहारी मंदिर
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वृंदावन बांके बिहारी मंदिर: ब्रज के दिल वृंदावन में स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर के नियम सबसे अनोखे हैं। इस मंदिर के नियम बाकी सभी हिंदू मंदिरों से बिल्कुल अलग हैं। आमतौर पर अन्य मंदिरों में सुबह की शुरुआत शंख और घंटियों की गूंज से होती है। लेकिन ठाकुर बांके बिहारी जी के दरबार में पूरी तरह सन्नाटा रहता है।

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इस पावन दरबार में न तो घंटियां बजाने की इजाजत है और न ही सुबह जल्दी मंगला आरती होती है। क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों। आइए जानते हैं इस अद्भुत परंपरा के पीछे की पूरी कहानी।

बांकेबिहारी का विग्रह कैसे हुआ था प्रकट... श्रीकृष्ण के इस प्राचीन मंदिर की  क्या है मान्यता - banke bihari temple mathura darshan timing controversy  pooja tradition mismanagement ...

बांके बिहारी विग्रह का इतिहास 

इस कहानी की शुरुआत आज से करीब पांच सौ साल पहले हुई थी। उस समय वृंदावन कोई शहर नहीं बल्कि एक बहुत ही शांत जंगल था। इसी पावन धरती पर संगीत के महानायक स्वामी हरिदास जी रहते थे। वे भगवान श्री कृष्ण के बहुत बड़े परम भक्त भी थे। कहा जाता है कि जब हरिदास जी गाते थे, तो हवाएं रुक जाती थीं।

पशु और पक्षी भी अपनी सुध-बुध खोकर उनका संगीत सुनते थे। एक दिन जब वे निधिवन में भजन गा रहे थे, तब एक चमत्कार हुआ। उनके सामने एक बहुत ही तेज और अलौकिक प्रकाश प्रकट हुआ। उस दिव्य रोशनी के बीच साक्षात राधा और कृष्ण मुस्कुराते हुए दिखाई दिए। यह रूप इतना तेजस्वी था कि आम लोग इसे नहीं देख सकते थे।

तब स्वामी हरिदास जी ने हाथ जोड़कर प्रभु से एक प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि प्रभु, आपके इस विराट तेज को सब नहीं देख पाएंगे। उन्होंने भगवान से कोई बहुत ही सौम्य और सुंदर रूप धारण करने को कहा। इसके बाद राधा-कृष्ण एक-दूसरे में पूरी तरह समा गए। तभी वहां त्रिभंग मुद्रा में साक्षात बांके बिहारी जी की मूर्ति प्रकट हुई। इस मूर्ति की सुंदरता आज भी हर किसी का मन मोह लेती है।

Shri Banke Bihari Mandir - Darshan & History

बांके बिहारी मंदिर में घंटी क्यों नहीं बजाती

बांके बिहारी मंदिर में प्रवेश करते ही आपको एक अद्भुत शांति मिलेगी। आपको पूरे मंदिर परिसर में एक भी घंटी दिखाई नहीं देगी। इसके पीछे का तर्क भक्तों की ममता और प्रेम से जुड़ा हुआ है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां बिहारी जी भगवान नहीं हैं। उन्हें यहां एक छोटे और सुकुमार बालक के रूप में पूजा जाता है।

भारी घंटियों की आवाज से छोटे बच्चे की नींद खराब हो सकती है। बच्चा डर न जाए, इसलिए सदियों से यहां घंटी बजाना वर्जित है। इसी कारण यहां सुबह जल्दी मंगला आरती भी नहीं की जाती है। मान्यता है कि ठाकुर जी रोज रात को निधिवन में रास रचाते हैं।

रातभर नाचने के बाद लाला बहुत बुरी तरह थक जाते हैं। थकने के कारण वे सुबह भोर के समय गहरी नींद में सोते हैं। ऐसे में उन्हें सुबह जल्दी जगाना ममता के नियमों के खिलाफ है। इसलिए वे अपनी मर्जी से सुबह आराम से सोकर उठते हैं। साल में सिर्फ जन्माष्टमी के अगले दिन ही यहां मंगला आरती होती है।

Banke Bihari Mandir Rajwada Chowk, Indore City, Dist. Indore - Pilgrim Data  Services

हर दो मिनट में पर्दा क्यों डाला जाता है

इस मंदिर में हर दो मिनट में ठाकुर जी के आगे पर्दा डाला जाता है। इसके पीछे की एक सच्ची घटना बहुत ही भावुक करने वाली है। कथा के मुताबिक, सदियों पहले वृंदावन में एक बूढ़ी महिला रहती थी। उसका इस दुनिया में कोई नहीं था और वह बहुत अकेली थी। वह दुनिया के तानों से परेशान होकर बिहारी जी के मंदिर आ गई।

उसने जब ठाकुर जी के बाल रूप को देखा, तो रो पड़ी। उसने मन ही मन ठाकुर जी को अपना सगा बेटा मान लिया। उसने अपनी सारी संपत्ति भी भगवान के नाम करने का मन बना लिया। जैसे ही वह महिला जाने के लिए मुड़ी, एक बड़ा अजूबा हुआ। बांके बिहारी जी की विग्रह मूर्ति अपने आसन से उतर गई।

आसन से उतर गए बांके बिहारी

भगवान उस बुढ़िया के पीछे-पीछे मंदिर से बाहर चल पड़े। जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी मां के पीछे भागता है, वैसे ही वे गए। यह देखकर मंदिर के पुजारियों में हड़कंप मच गया। उन्होंने भागकर महिला को रोका और ठाकुर जी से वापस आने की मिन्नतें कीं। पुजारियों ने कहा कि लाला लौट आओ, पूरे ब्रज को तुम्हारी जरूरत है। बहुत मनुहार करने के बाद भगवान वापस अपने आसन पर बैठे।

इसी घटना के बाद से मंदिर में बार-बार पर्दा गिराने का नियम बना। मान्यता है कि कोई उनकी जादुई आंखों में लगातार न झांके। अगर कोई सच्चे प्रेम से उन्हें देखेगा, तो वे फिर मंदिर छोड़ देंगे। भक्तों के इसी अगाध प्रेम से बचाने के लिए पर्दा गिरता है।

बांके बिहारी मंदिर में गायब खजाने का रहस्य

बांके बिहारी मंदिर का नाता कई प्राचीन रहस्यों से भी जुड़ा है। पुरानी लोक कथाओं के मुताबिक, इस मंदिर के नीचे सुरंग थी। ये गुप्त सुरंग सीधे जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर तक जाती थी। मुगल आक्रमण के समय इसी रास्ते से मूर्तियां छिपाई जाती थीं। आज के संत इसे सिर्फ रास्ता नहीं बल्कि एक ऊर्जा पथ मानते हैं। इसके अलावा मंदिर का एक बंद कमरा भी रहस्य था।

लोग कहते थे कि उस कमरे में अरबों रुपये का खजाना है। उस गुप्त खजाने की रक्षा इच्छाधारी नाग करते हैं। इतिहास के मुताबिक, जब धनतेरस पर इस कमरे को खोला गया तो कुछ नहीं मिला। वहां सोने के बजाय सिर्फ मिट्टी और खाली पात्र मिले।

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, मंदिर में तीन बार बड़ी चोरियां हुई थीं। साल 1926, 1936 और 1971 में सारा खजाना चोरी हो गया था। लेकिन ब्रजवासियों का मानना है कि बिहारी जी का खजाना उनकी मुस्कान है। वही मुस्कान हर साल करोड़ों भक्तों को वृंदावन खींच लाती है।

ठाकुर जी के चरण कमलों के दर्शन कब होते हैं

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी के चरण कमलों के दर्शन करना बेहद दुर्लभ माना जाता है। साल के 365 दिनों में से 364 दिन ठाकुर जी के चरण भारी वस्त्रों, आभूषणों और सुंदर सुगंधित फूलों से पूरी तरह ढके रहते हैं।

भक्तों को उनके पवित्र चरणों के सीधे दर्शन करने का सौभाग्य पूरे वर्ष में केवल एक बार, अक्षय तृतीया के पावन दिन पर ही मिलता है। इस परंपरा के पीछे गहरी धार्मिक मान्यता है। माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन बांके बिहारी जी के चरणों के साक्षात दर्शन करने से मनुष्य (Vrindavan) के सात जन्मों के पाप धुल जाते हैं।

इसके साथ ही, मान्यता है कि जो भक्त इस दिन लाला के चरणों का आशीर्वाद लेता है, उसके जीवन से आर्थिक तंगी हमेशा के लिए दूर हो जाती है। उसके घर में कभी भी धन-धान्य और सुख-समृद्धि की कमी नहीं होती है।

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।

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