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किस देवता की कितनी बार करें परिक्रमा, जानें सही तरीका और मंत्र

परिक्रमा
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परिक्रमा: हिंदू धर्म में पूजा के दौरान परिक्रमा का बहुत महत्व है। इसे प्रदक्षिणा भी कहा जाता है और यह बहुत फलदायी है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि इससे पुराने पाप धुल जाते हैं। परिक्रमा करने से व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। यह पुण्य जीवन भर शुभ फल प्रदान करता रहता है।

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परिक्रमा करने से मन और शरीर दोनों ही शुद्ध होते हैं। विज्ञान कहता है कि मंदिर में सकारात्मक ऊर्जा मौजूद रहती है। मूर्ति के चारों ओर घूमने से यह ऊर्जा हमें मिलती है। इससे हमारे मन के सभी नकारात्मक विचार दूर हो जाते हैं। विचारों में पवित्रता आती है और ईश्वर के प्रति श्रद्धा बढ़ती है।

दाहिने हाथ की तरफ से परिक्रमा के नियम

परिक्रमा हमेशा दाहिने हाथ की तरफ से शुरू करनी चाहिए। इसे प्रदक्षिणा कहते हैं क्योंकि दक्षिण दिशा दाहिनी मानी जाती है। मंदिर में घुसते ही हमेशा सीधे हाथ की तरफ से चलें। यही तरीका शास्त्रों में सबसे उत्तम और सही बताया गया है। उल्टी दिशा में घूमने से पूजा का फल नहीं मिलता है।

परिक्रमा के दौरान मन में केवल भगवान का ध्यान रखें। केवल गोल घूमना ही परिक्रमा का मुख्य उद्देश्य नहीं होता। भगवान के नाम का निरंतर जप करते रहना बहुत जरूरी है। इससे मन शांत होता है और मानसिक शक्ति भी बढ़ती है।

किस देवता की कितनी बार करें परिक्रमा?

परिक्रमा: हर देवता के लिए परिक्रमा की संख्या अलग-अलग बताई गई है। सूर्य देव की सात बार परिक्रमा करना सबसे शुभ है। भगवान गणेश जी की तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। श्री हरि विष्णु और उनके अवतारों की चार परिक्रमा करें। माता दुर्गा की केवल एक बार परिक्रमा की जाती है।

हनुमान जी के लिए तीन बार परिक्रमा का विधान है। पीपल के पेड़ की 108 या सात बार परिक्रमा करें। भगवान शिव की केवल आधी परिक्रमा ही करनी चाहिए। शिवलिंग की जलधारी को कभी भी लांघना नहीं चाहिए। जहाँ से जल बहता है, वहीं से वापस लौट आएं।

परिक्रमा के समय बोलने वाला शक्तिशाली मंत्र

परिक्रमा करते समय एक विशेष मंत्र बोलना बहुत लाभकारी है। मंत्र है: “यानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च। तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।” इसका अर्थ है कि हमारे सभी पुराने पाप नष्ट हो जाएं। जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिल जाती है। यह मंत्र हमें शुद्ध विचार और सही बुद्धि देता है।

परिक्रमा करते समय शरीर में हल्का रक्त संचार बढ़ता है। इससे तनाव कम होता है और ऊर्जा का संतुलन बनता है। परिक्रमा के समय हमेशा सावधानी और गहरा अनुशासन रखें। कभी भी जल्दबाजी न करें और धीरे-धीरे ही चलें।

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