देवकी के 6 पुत्रों का रहस्य: श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा बहुत प्रसिद्ध है। हम सभी जानते हैं कि कंस ने देवकी के छह बच्चों को मारा था। आकाशवाणी के बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया था। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वे छह बालक असल में कौन थे।
आखिर उनका क्या अपराध था कि उन्हें जन्म लेते ही मृत्यु मिली। श्रीमद्भागवत और हरिवंश पुराण में इसका बहुत सुंदर उत्तर दिया गया है। इस पौराणिक कथा को शास्त्रों में सद्गर्भ कथा कहा जाता है। यह कथा पूर्वजन्म के कर्मों और शापों से जुड़ी हुई है। वे छह बालक कोई साधारण मानव शिशु नहीं थे।
वे पूर्वजन्म में बहुत ज्ञानी और महर्षि मरीचि के पुत्र थे। उन्हें एक भूल के कारण ब्रह्मा जी से श्राप मिला था। उसी श्राप को पूरा करने के लिए उन्होंने जन्म लिया था। बाद में स्वयं श्रीकृष्ण ने अपनी माता देवकी को उनके दर्शन कराए थे। यह कथा हमें सिखाती है कि कर्मों का फल हर किसी को भुगतना पड़ता है। आइए जानते हैं देवकी के छह पुत्रों का पूरा सच।
कौन थे पूर्वजन्म में वे छह बालक
देवकी के 6 पुत्रों का रहस्य: श्रीमद्भागवत गीता के मुताबिक, प्रथम मनवंतरा में महर्षि मरीचि रहते थे। महर्षि मरीचि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र माने जाते हैं। उनकी पत्नी का नाम उर्णा था। उर्णा के गर्भ से छह तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ।
इन छह भाइयों के नाम कीर्तन, सुचरित्र, अधिकारी, वाग्मी, पातंग और क्षुद्रभृत् थे। ये सभी भाई बहुत ज्ञानी और तपस्वी स्वभाव के थे। वे हमेशा धर्म के मार्ग पर चलते थे। उन्होंने कठोर तपस्या करके कई दिव्य शक्तियां हासिल की थीं। वे देवताओं के प्रिय थे।
ब्रह्मा जी का श्राप
देवकी के 6 पुत्रों का रहस्य: एक बार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी अपनी पुत्री सरस्वती को देखकर मोहित हो गए। यह देखकर मरीचि के छह पुत्रों को बहुत हंसी आ गई। वे जोर-जोर से हंसने लगे। उन्होंने भरे समाज में ब्रह्मा जी के इस रूप का मजाक उड़ाया। वे खुद पर काबू न रख सके।
यह देखकर ब्रह्मा जी बहुत क्रोधित हो गए। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। ब्रह्मा जी ने उन्हें तुरंत श्राप दे दिया। उन्होंने कहा कि तुम असुर कुल में जन्म लोगे। तुमने ज्ञानी होकर भी मेरा अपमान किया है। इसलिए तुम्हें दैत्य कुल में जाना पड़ेगा।
दैत्यराज हिरण्यकशिपु के घर पहला जन्म
देवकी के 6 पुत्रों का रहस्य: ब्रह्मा जी के श्राप के कारण छह भाइयों ने दैत्य कुल में जन्म लिया। वे दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पुत्र के रूप में पैदा हुए। वहां उनका नाम सद्गर्भ पड़ा। वे असुर कुल में जन्म लेकर भी धार्मिक विचार वाले बने रहे। उन्होंने असुरों की राह नहीं चुनी। वे भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहने लगे।
यह बात हिरण्यकशिपु को पसंद नहीं आई। हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु से बहुत नफरत करता था। वह अपने पुत्रों से बहुत नाराज हो गया। उसने अपने ही पुत्रों को पाताल लोक में जाने का श्राप दे दिया। उसने उन्हें सो जाने को कहा।
योगमाया का गुप्त प्रभाव और नया जन्म
देवकी के 6 पुत्रों का रहस्य: समय बीतता गया और द्वापर युग का आगमन हुआ। पृथ्वी पर पाप बहुत बढ़ गया था। भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करने की योजना बनाई। उन्होंने अपनी योगमाया को एक काम सौंपा। विष्णु जी ने योगमाया से कहा कि तुम पाताल में सो रहे छहों भाइयों को उठाओ।
उन्हें देवकी के गर्भ में स्थापित कर दो। इस तरह वे देवकी के पहले छह पुत्र बने। योगमाया ने अपनी शक्ति से एक-एक करके छहों बालकों को देवकी के गर्भ में पहुंचाया। इस तरह महर्षि मरीचि के पुत्रों ने देवकी के पेट से जन्म लिया।
कंस ने क्यों किया इन बालकों का वध
श्रीमद्भागवत महापुराण के मुताबिक, कंस पूर्वजन्म में कालनेमि नाम का भयंकर असुर था। वह बहुत क्रूर था। विष्णु जी ने युद्ध में कालनेमि का वध किया था। इसलिए कंस विष्णु जी से बैर रखता था।
आकाशवाणी ने कंस को बताया था कि देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। कंस बहुत डर गया था। उसने देवकी के हर बच्चे को मारना शुरू कर दिया।
कंस को लगता था कि हर बच्चा उसका शत्रु हो सकता है। उसने छहों बालकों को मार डाला। इस तरह छहों भाइयों को कंस के हाथों मृत्यु मिली। उन्हें अपने श्राप से मुक्ति मिल गई।
जब श्रीकृष्ण ने देवकी को कराए छहों पुत्रों के दर्शन
श्रीमद्भागवत महापुराण के मुताबिक, कंस का वध करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने माता-पिता को जेल से छुड़ाया। माता देवकी अपने छह मृत पुत्रों को याद करके रोती थीं। वे बहुत दुखी रहती थीं।उनकी इस पीड़ा को देखकर श्रीकृष्ण और बलराम सुतुल लोक चले गए। वहां बलि महाराज के पास वे छहों बालक सुरक्षित रह रहे थे। कान्हा उन्हें वापस ले आए।
श्रीकृष्ण ने उन छहों बालकों को माता देवकी की गोद में रख दिया। देवकी ने अपने छहों बच्चों को बहुत प्यार किया। उन्हें अपना दूध पिलाया। दूध पीते ही उन छहों बालकों के सारे पाप धुल गए। उन्हें अपना असली रूप मिल गया। वे सभी बालक देवकी और श्रीकृष्ण को प्रणाम करके सीधे स्वर्ग लोक चले गए।
सद्गर्भ कथा से मिलने वाली सीख
पौराणिक सद्गर्भ कथा हमें कर्म चक्र का महान नियम सिखाती है। इस कथा के अनुसार व्यक्ति चाहे कितना भी ज्ञानी क्यों न हो, बड़ों का अनादर करने या गलत काम करने पर उसका फल अवश्य भुगतना पड़ता है।
महर्षि मरीचि के छहों पुत्रों ने ब्रह्मा जी का उपहास उड़ाया था। इसके कारण उन्हें असुर और फिर मानव के रूप में जन्म लेने का श्राप मिला। शास्त्रों में सद्गर्भ का अर्थ पवित्र जन्म स्थान होता है।
वे छहों आत्माएं अत्यंत पवित्र थीं, जिन्हें कंस के हाथों मृत्यु मिलकर मुक्ति प्राप्त हुई। यह कथा बताती है कि ईश्वर की हर लीला के पीछे गहरा कारण होता है और भक्ति से अंततः परम धाम की प्राप्ति होती है।
देवकी के आठों बच्चों के बारे में
श्रीमद्भागवत महापुराण के मुताबिक, जानें माता देवकी के आठों संतानों के जन्म और उनके उद्देश्य के बारे में। माता देवकी के पहले छह पुत्रों के नाम कीर्तिमान, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, सम्मर्दन और भद्र थे।
महर्षि मरीचि के छहों पुत्रों (सद्गर्भ) को उनके श्राप के कारण देवकी के गर्भ से जन्म लेना पड़ा था। कंस ने अपने काल के भय से इन पहले छहों नवजात शिशुओं को जन्म लेते ही शिला पर पटककर मार दिया था।
सातवें बच्चे के रूप में शेषनाग के अवतार बलराम जी गर्भ में आए, जिन्हें योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। आठवें बच्चे के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, जिन्होंने कंस का वध कर पृथ्वी को पापों से मुक्त किया।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। पौराणिक कथाएं
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