ujjainsimhastha

सावन का महीना क्यों है इतना खास और क्या है इसका धार्मिक महत्व

सावन का महीना
Spread the love

सावन का महीना: हिंदू कैलेंडर में सावन के महीने का एक बहुत ही विशेष स्थान है। यह महीना पूरी तरह से देवों के देव महादेव को समर्पित होता है। इस दौरान चारों तरफ का माहौल बहुत ही भक्तिमय हो जाता है।शिव भक्त पूरे साल इस पवित्र महीने का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

गूगल पर उज्जैन सिंहस्थ चुनें ! Add as a preferred source on Google

माना जाता है कि इस महीने में शिव पूजा तुरंत फल देती है। भोलेनाथ अपने भक्तों की हर पुकार को बहुत जल्दी सुनते हैं। इस महीने में प्रकृति भी अपनी सुंदरता के चरम पर होती है। हर तरफ हरियाली छा जाती है और झमाझम बारिश होती है। यह सुहाना मौसम मन को एक अनोखी शांति प्रदान करता है।

भगवान शिव को ये महीना क्यों प्रिय है

सावन का महीना: सावन के महीने को लेकर कई तरह की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। सबसे मुख्य कथा माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह से जुड़ी है। माता पार्वती ने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए तप किया था।

उन्होंने कई सालों तक भूखे-प्यासे रहकर बहुत ही कठिन तपस्या की थी। उनकी इस सच्ची भक्ति से भोलेनाथ बेहद प्रसन्न हुए थे। इसके बाद उन्होंने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यह शुभ विवाह सावन के महीने में ही संपन्न हुआ था। इसी वजह से यह महीना शिव जी के दिल के बेहद करीब है। सुहागिन महिलाएं इस महीने में अखंड सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं।

समुद्र मंथन की वो अनोखी घटना

सावन महीने का संबंध पौराणिक काल के समुद्र मंथन से भी गहरा है। देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया था। इस मंथन के दौरान चौदह कीमती रत्न बाहर निकले थे। रत्नों के साथ ही एक भयंकर विष भी बाहर आया था।

इस विष का नाम हलाहल था जो बेहद खतरनाक था। इसकी गर्मी से पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया था। तब संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव आगे आए थे। उन्होंने उस जहरीले विष को खुद ही पी लिया था। उन्होंने विष को अपने गले से नीचे नहीं उतरने दिया था।

शिव जी को जल-दूध चढ़ाने का कारण

विष के प्रभाव के कारण शिव जी का गला एकदम नीला पड़ गया था। इसी वजह से उनका एक नाम नीलकंठ भी पड़ा। विष की वजह से उनके शरीर का तापमान बहुत बढ़ गया था। उनके शरीर को शीतलता देने के लिए देवताओं ने जल बरसाया था।

तभी से सावन में शिव जी पर जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सावन में जल चढ़ाना सही माना गया है। बारिश के मौसम में जल और दूध का अर्पण शरीर को संतुलित रखता है। यह हमें प्रकृति से जुड़ने का संदेश देता है।

सावन सोमवार व्रत की महिमा

सावन के महीने में सोमवार के व्रत का बहुत बड़ा महत्व है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है। जीवन के सभी आर्थिक और मानसिक संकट दूर हो जाते हैं। इसी महीने में मशहूर कांवड़ यात्रा की शुरुआत भी होती है।

लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं। वे इस जल को अपने स्थानीय शिव मंदिर में चढ़ाते हैं। कहते हैं कि सबसे पहले परशुराम जी ने कांवड़ यात्रा शुरू की थी। उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव का अभिषेक किया था। तब से यह अटूट परंपरा लगातार चली आ रही है।

सावन के महीने में सोमवार के व्रत का क्या महत्व है

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार सावन के महीने में आने वाले सभी सोमवार बेहद शुभ और फलदायी होते हैं। इस दिन व्रत रखने का विशेष महत्व है क्योंकि सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा करने से कुंडली के सभी दोष दूर हो जाते हैं। पौराणिक मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए सावन के महीने में ही कठोर सोमवार व्रत रखे थे।

अविवाहित कन्याएं इस व्रत को मनचाहा और योग्य वर पाने के लिए रखती हैं, जबकि सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए यह व्रत करती हैं। इसके अलावा यह व्रत मानसिक शांति और आर्थिक उन्नति भी प्रदान करता है।

Scroll to Top