समझें क्या है पूरा मामला
- सिंहस्थ 2028 से पहले शिप्रा नदी को साफ करने की तैयारी तेज है।
- उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने आधुनिक तकनीक के लिए ईओआई जारी किया है।
- तकनीक से शिप्रा में ऑक्सीजन बढ़ेगी और प्रदूषक तत्व कम होंगे।
- पहले 3 से 5 किलोमीटर क्षेत्र में पायलट परीक्षण होगा, फिर विस्तार होगा।
- प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तारीख 31 अगस्त तय की गई है।
सिंहस्थ 2028 से पहले शिप्रा नदी को साफ बनाने की कवायद तेज है। उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने आधुनिक तकनीक की तलाश शुरू की है। इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट यानी ईओआई जारी किया गया है। लक्ष्य है कि शिप्रा नदी सिंहस्थ से पहले पूरी तरह स्नान योग्य बने। पहले चरण में 3 से 5 किलोमीटर क्षेत्र में तकनीक का पायलट परीक्षण होगा।
कैसी तकनीक चाहिए
सिंहस्थ 2028: उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड यानी USCL ने खास तकनीक मांगी है। यह तकनीक शिप्रा के पानी में घुलित ऑक्सीजन बढ़ा सके। साथ ही यह बीओडी, सीओडी, अमोनिया और दुर्गंध भी कम करे। मकसद यह है कि तकनीक का असर सिर्फ कागज पर न दिखे। नदी के पानी की गुणवत्ता में भी बदलाव दिखना जरूरी है। इसके लिए रियल टाइम मॉनिटरिंग की व्यवस्था भी मांगी गई है।
पहले होगा वैज्ञानिक आकलन
सिंहस्थ 2028: तकनीक लगाने से पहले शिप्रा की मौजूदा हालत जांची जाएगी। इसमें बेसलाइन सर्वे और नदी सर्वे शामिल हैं। जल प्रवाह और प्रदूषण भार की भी जांच होगी। पानी की गुणवत्ता को गणितीय मॉडलिंग से भी परखा जाएगा। हाइड्रोडायनामिक सिमुलेशन के जरिए प्रदूषण के हॉटस्पॉट भी चिह्नित किए जाएंगे। यानी पहले समस्या की जड़ पहचानी जाएगी। इसके बाद ही सही तकनीक तय होगी।
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नैनोबबल से बायो उपचार तक
प्रस्ताव में कई आधुनिक तकनीकों के विकल्प दिए जा सकते हैं। इनमें एडवांस्ड ऑक्सीनेशन और नैनोबबल तकनीक शामिल हैं। इन-सिटू बायोरिमेडिएशन और फ्लोटिंग ट्रीटमेंट सिस्टम भी विकल्पों में हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रोकेमिकल ट्रीटमेंट और प्राकृतिक समाधान भी सुझाए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर एक से ज्यादा तकनीकों को भी मिलाया जा सकता है। यानी कंपनियों को समाधान चुनने की पूरी छूट दी गई है।
सिंहस्थ के दबाव में परीक्षा
तकनीक को सिंहस्थ के भारी दबाव में भी कारगर साबित होना होगा। उस दौरान नदी में जल प्रवाह कम रहता है। साथ ही श्रद्धालुओं की संख्या बहुत ज्यादा होती है। पीक स्नान के दिनों में जैविक प्रदूषण भी बढ़ जाता है। तकनीक को गर्मी, सर्दी और मानसून तीनों मौसम में असरदार रहना होगा। कम ऊर्जा खपत और कम रखरखाव को भी प्राथमिकता दी जाएगी। तेज तैनाती और डिजिटल मॉनिटरिंग की क्षमता भी जरूरी होगी।
पहले टेस्ट, फिर बड़ा फैसला
पहले चरण में सिर्फ 3 से 5 किलोमीटर क्षेत्र में पायलट परीक्षण होगा। इसके नतीजों की जांच स्वतंत्र थर्ड पार्टी संस्था करेगी। नतीजे संतोषजनक रहने पर योजना को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके बाद नगर निगम सीमा में तकनीक लागू हो सकेगी। यह क्षेत्र करीब 12 से 15 किलोमीटर होगा। डिजाइन, कमीशनिंग, मॉनिटरिंग और रखरखाव भी इस प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। साथ ही तकनीकी जानकारी का हस्तांतरण भी किया जाएगा।
अभी तय नहीं कितना होगा खर्च
फिलहाल यह सिर्फ तकनीक तलाशने और शॉर्टलिस्ट करने की प्रक्रिया है। अभी किसी कंपनी को सीधे काम नहीं दिया जा रहा है। न ही अभी कोई तय बजट घोषित किया गया है। पायलट परीक्षण के नतीजों के आधार पर आगे खरीद प्रक्रिया शुरू होगी। कंपनियां अलग-अलग तरह के भुगतान मॉडल भी सुझा सकती हैं। इनमें कैपेक्स, डीबीओ और बूट मॉडल शामिल हैं। ट्रीटमेंट-एज-ए-सर्विस और पीपीपी मॉडल के सुझाव भी दिए जा सकते हैं।
आवेदन के लिए यह शर्तें जरूरी
USCL के मुताबिक आवेदक कंपनी के पास अनुभव होना जरूरी है। पिछले पांच साल में इसी तरह का एक सफल प्रोजेक्ट जरूरी है। तकनीक को एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) और सीपीएचईईओ (सेंट्रल पब्लिक हेल्थ एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग ऑर्गेनाइजेशन) मानकों पर भी खरा उतरना होगा। कंपनी का पिछले तीन साल का औसत टर्नओवर भी तय है। यह रकम कम से कम पांच करोड़ रुपए सालाना होनी चाहिए। प्री-ईओआई बैठक और साइट विजिट 19 अगस्त को रखी गई है। प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तारीख 31 अगस्त तय की गई है।
शिप्रा सफाई के बाकी काम
नई तकनीक के अलावा शिप्रा को साफ रखने पर भी काम चल रहा है। प्रदेश सरकार प्रदूषण के स्रोतों को रोकने पर भी जोर दे रही है। 1133 करोड़ रुपए की कान्ह डायवर्शन क्लोज डक्ट परियोजना इसका हिस्सा है। इस परियोजना से कान्ह नदी का गंदा पानी शिप्रा में मिलने से रोका जाएगा। नमामि गंगे मिशन के तहत भी दो बड़े काम हो रहे हैं। पीलियाखाल नाले पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जा रहा है। भैरवगढ़ नाले पर भी ईटीपी प्लांट लगाया जा रहा है। यह काम 81 करोड़ रुपए की लागत से हो रहा है।
अमृत मिशन के तहत भी बड़ा निवेश किया जा रहा है। इसके तहत 912 करोड़ रुपए से भूमिगत सीवरेज पाइपलाइन बिछाई जा रही है। शिप्रा में जल प्रवाह बनाए रखने के लिए भी योजना है। सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी बांध परियोजना इसी मकसद से बन रही है। इस परियोजना पर 445 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। इन सभी परियोजनाओं के साथ नई तकनीक भी जुड़ेगी। यह कोशिश शिप्रा की सफाई और जल सुधार की बड़ी योजना का हिस्सा है।
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