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जन्माष्टमी पर क्यों लगता है धनिया पंजीरी का भोग? जानिए धार्मिक-वैज्ञानिक कारण

जन्माष्टमी
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Janmashtami Dhaniya Panjiri: जन्माष्टमी की बात हो और धनिया पंजीरी का नाम न आए, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। हमारे प्यारे नटखट कान्हा के जन्मोत्सव पर घर-घर में धनिया पंजीरी का प्रसाद बनाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आटे या सूजी के हलवे की जगह कान्हा को धनिया की पंजीरी ही क्यों सबसे ज्यादा प्रिय है? 

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असल में इसके पीछे सिर्फ पूजा-पाठ की परंपरा ही नहीं है, बल्कि हमारे पूर्वजों और ऋषियों की बहुत बड़ी वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक समझ छिपी हुई है। इस साल 4 सितंबर 2026 को देशभर में जन्माष्टमी मनाई जाएगी।

बाल गोपाल के जन्मदिन पर भक्त तरह-तरह के पकवान बनाते हैं। आटे या सूजी की पंजीरी के बजाय धनिया की पंजीरी का उपयोग सदियों से परंपरा का हिस्सा रहा है। इसके पीछे धार्मिक आस्था के साथ-साथ सेहत से जुड़े वैज्ञानिक कारण भी छिपे हुए हैं। आइए इसे जानें…

Janmashtami Dhaniya Panjiri

शास्त्रों और धर्म में धनिया का महत्व

जन्माष्टमी: शास्त्रों और सनातन परंपरा में धनिया केवल रसोई का एक साधारण मसाला नहीं, बल्कि अत्यंत पवित्र, सात्विक और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, धनिया का सीधा संबंध धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी से है। ज्योतिष और पूजा पद्धतियों में धनिया को धान्य यानी समृद्धि का कारक माना जाता है।

यही कारण है कि दीपावली जैसे बड़े पर्वों पर मां लक्ष्मी की पूजा में साबुत सूखा धनिया विशेष रूप से अर्पित किया जाता है। उसे घर के तिजोरी में रखा जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब शास्त्रों के मुताबिक, उनके बालरूप के स्वागत में धनिया और देसी घी से निर्मित सात्विक मिष्ठान तैयार किया गया।

धार्मिक मान्यता है कि जन्मोत्सव पर कान्हा को धनिया पंजीरी अर्पित करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती, दरिद्रता दूर भागती है और परिवार में मां लक्ष्मी का स्थायी वास बना रहता है। यही कारण है कि सदियों से चली आ रही इस पावन परंपरा के तहत जन्माष्टमी पर धनिया पंजीरी का भोग अनिवार्य रूप से लगाया जाता है।

आयुर्वेद से जुड़ा गहरा स्वास्थ्य कनेक्शन

जन्माष्टमी: अब बात करते हैं इसके सेहत वाले राज की। सितंबर के समय मानसून यानी बारिश का मौसम रहता है। आयुर्वेद के मुताबिक, इस मौसम में शरीर में पित्त और वात दोष बढ़ जाते हैं। इससे हमारी पाचन शक्ति थोड़ी कमजोर हो जाती है। धनिया तासीर में ठंडा होता है। यह पेट की गर्मी को शांत करता है। दिनभर व्रत रखने के बाद जब भक्त इस प्रसाद को खाते हैं, तो उनका पेट एकदम शांत और स्वस्थ रहता है।

  • ऋतु परिवर्तन और वात-पित्त का संतुलन:भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) का महीना मानसून यानी वर्षा ऋतु का समय होता है। आयुर्वेद के मुताबिक इस मौसम में हवा में नमी और वातावरण के बदलाव के कारण शरीर में पित्त और वात दोष प्राकृतिक रूप से बढ़ जाते हैं। इससे पेट में जलन, एसिडिटी, गैस और पाचन तंत्र का धीमा पड़ना जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं।
  • धनिए की ठंडी तासीर:धनिया तासीर में बेहद ठंडा (शीत गुण) और सुपाच्य होता है। जब मानसून में शरीर का पित्त बढ़ता है, तब धनिया का सेवन पेट की गर्मी और जलन को तुरंत शांत करता है।
  • उपवास के बाद पाचन की सुरक्षा:जन्माष्टमी पर भक्त दिनभर निर्जला या फलाहारी व्रत रखते हैं। लंबे उपवास के बाद जब अचानक भोजन किया जाता है, तो जठराग्नि पर दबाव पड़ता है। धनिया पंजीरी में मौजूद धनिया, देसी घी, मखाने और खांड का मिश्रण पेट को अचानक लगने वाले झटके से बचाता है, आंतों को आराम देता है और पाचन क्रिया को बिना कोई नुकसान पहुंचाए सुचारू रूप से शुरू करता है।
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धनिया पंजीरी बनाने की विधि

कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण के भोग के लिए धनिया पंजीरी बनाने की आसान विधि यहां जानें…

सामग्री:

  • साबुत धनिया: 1 कप (या पिसा हुआ धनिया पाउडर)
  • शुद्ध देसी घी: 3 से 4 बड़े चम्मच
  • देशी खांड या पिसी चीनी: 1/2 कप
  • मखाने: 1/2 कप (कटे हुए)
  • काजू और बादाम: 2-2 बड़े चम्मच (बारीक कटे हुए)
  • कद्दूकस किया नारियल (गरी): 2 बड़े चम्मच
  • तुलसी के पत्ते: 4-5 (भोग के लिए)

बनाने की विधि:

  • अगर आप साबुत धनिया इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उसे धीमी आंच पर 1-2 मिनट सूखा भून लें और ठंडा होने पर मिक्सी में दरदरा पीस लें।
  • एक कढ़ाई में दो चम्मच देसी घी गरम करें। इसमें मखाने, काजू और बादाम डालकर हल्का सुनहरा होने तक भून लें और प्लेट में निकाल लें।
  • अब उसी कढ़ाई में बचा हुआ दो चम्मच घी डालें। इसमें पिसा हुआ धनिया डालें और धीमी आंच पर 3-4 मिनट तक लगातार चलाते हुए भूनें, जब तक कि अच्छी खुशबू न आने लगे।
  • धनिया भुन जाने पर उसमें कद्दूकस किया नारियल और भुने हुए ड्राई फ्रूट्स मिला दें। एक मिनट बाद गैस बंद कर दें।
  • इस मिश्रण को एक बर्तन में निकालकर पूरी तरह ठंडा होने दें। ठंडा होने के बाद ही इसमें पिसी चीनी या खांड मिलाएं। गरम में मिलाने पर चीनी पानी छोड़ देगी।
  • सभी चीजों को अच्छे से मिला लें और ऊपर से तुलसी के पत्ते रखकर कान्हा जी को अर्पित करें।

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।

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